"तेरे सिवा मेरा कौन है"
बहुत दूर तक गया था मैं,
ज़िंदगी की धूप में अपने हिस्से की हार लिए,
कुछ सपनों के टूटे हुए टुकड़े,
कुछ उम्मीदों की राख लिए।
जब लौटा अपने घर की चौखट पर,
तो माँ के चेहरे ने यूँ थाम लिया मुझे,
जैसे बरसों से प्यासा कोई मुसाफ़िर,
पीपल की शीतल छाँव पा गया हो।
क्षण भर में सारे दुःख ओझल हो गए,
मानो समय ने अपने घाव समेट लिए हों,
मानो कुछ टूटा ही न था,
मानो मैं कभी बिखरा ही न था।
फिर रात को गया मैं अपनी उस पुरानी पनाहगाह के पास,
जहाँ मेरी हँसी भी सुरक्षित रही,
और मेरे आँसू भी सम्मान पाते रहे।
पर कल उसके द्वार बंद थे।
मुझे लगा जैसे वह भी मुझसे रूठ बैठी हो—
कह रही हो,
"आ गए दुनिया देख कर?
लोगों के चेहरे पहचान कर?
जीत और हार के अर्थ समझ कर?"
वर्षों का रिश्ता है हमारा,
मेरी हर ख़ुशी की साक्षी,
मेरे हर ग़म की हमराज़ रही है वह जगह।
मैंने भी मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और कहा—
"तू भी यदि मुझसे नाराज़ होकर बैठ जाएगी,
तो फिर तेरे सिवा मेरा अपना कौन है?
दुनिया ने तो हर मोड़ पर परखा है मुझे,
कम से कम तू तो मेरी पनाह बनी रह।"
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